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Dalit Panther | Dalit Panther Book In Hindi

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Description Dalit Panther | Dalit Panther Book In Hindi Dalit Panther Book is an essential resource for anyone interested in understanding the history, ideology, and impact of the Dalit Panther movement. This comprehensive guide delves into the origins of the movement, its key leaders, and the socio-political context in which it emerged. Understanding the Movement The book provides a detailed analysis of the Dalit Panther movement, which was founded in Maharashtra, India, in the 1970s. It explores the movement’s objectives, strategies, and its significance in challenging caste-based discrimination and advocating for the rights of Dalits. Through a series of well-researched chapters, the book examines the Dalit Panther’s role in mobilizing Dalit communities, promoting social equality, and fighting against oppression. It highlights the movement’s efforts to raise awareness about Dalit issues, organize protests, and challenge the dominant caste hierarchy. Key Features of the Dalit Panther Book The Dalit Panther Book offers a comprehensive overview of the movement, featuring: Insights into the historical context and roots of the Dalit Panther movement Profiles of prominent Dalit Panther leaders and their contributions An analysis of the movement’s impact on Dalit empowerment and social change Excerpts from original Dalit Panther manifestos, speeches, and writings Case studies highlighting the movement’s successes and challenges Whether you are a student, researcher, or simply interested in learning more about the Dalit Panther movement, this book provides a comprehensive and insightful exploration of its history, ideology, and impact. It serves as a valuable resource for anyone seeking to understand the struggles and achievements of the Dalit community in their fight for social justice and equality.   दलित पैंथर का गठन दिनांक 10 अप्रैल, 1970 को इल्यापेरूमल समिति की रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत की गई। रिपोर्ट में दलितों पर देश भर में हो रहे अत्याचारों के विस्तृत विवरण ने संसद को हिला कर रख दिया। इल्यापेरूमल सांसद थे, जिन्हें 1965 में देश में दलितों पर होने वाले अत्याचारों का अध्ययन कर उन्हें रोकने के उपाय सुझाने के लिए गठित समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। समिति ने अपनी रिपोर्ट 30 जनवरी, 1970 को सरकार को सौंप दी थी। परंतु सरकार उसे संसद में प्रस्तुत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। अंततः सरकार को विपक्षी पार्टियों की मांग के आगे झुकना पड़ा और रिपोर्ट संसद में पेश की गई। रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि दलितों के साथ न्याय करने में इंदिरा गांधी की सरकार पूरी तरह से असफल सिद्ध हुई है। इस रिपोर्ट से यह भी सामने आया कि दलितों पर अत्याचार करने वालों में मुख्यतः कांग्रेस नेता, ब्राह्मण और कुछ गैर-ब्राह्मण थे। इल्यापेरूमल समिति ने देश में दलितों पर अत्याचार की लगभग 11,000 घटनाओं का विवरण दिया। रिपोर्ट के अनुसार केवल एक वर्ष में 1,117 दलितों तकी हत्या कर दी गई थी। दलित महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहे थे और उन्हें नंगा करके गांवों में घुमाया जा रहा था। दलित महिलाओं और पुरुषों को पेयजल के सार्वजनिक स्रोतों का उपयोग करने, अच्छे कपड़े और चप्पल पहनने के लिए पीटा जा रहा था। दलित श्रमिकों को डराया-धमकाया जा रहा था और दलितों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे पानी के स्रोतों में मानव मल फेंका जा रहा था। इस रिपोर्ट ने जमीनी स्तर पर परिवर्तन के लिए लड़ रहे दलित युवकों के तन-बदन में आग लगा दी। आरपीआई के विभिन्न धड़ों के नेता तो असंवेदनशील बने रहे, परंतु युवा लेखकों और कवियों ने मांग की कि सरकार को इस मामले में तुरंत कार्यवाही करनी चाहिए। इस बीच दादर के ईरानी होटल में दया पवार, अर्जुन डांगले, नामदेव ढसाल, प्रह्लाद चेंदवणकर और मेरी मुलाकातों का सिलसिला जारी रहा। एक दिन चर्चा के दौरान हम सब ने एकमत से निर्णय लिया कि हमें सरकार को चेतावनी देते हुए एक वक्तव्य जारी करना चाहिए। हमने तय किया कि वक्तव्य पर 12 दलित लेखकों के हस्ताक्षर हासिल किए जाएं। परंतु बाबाव बागुल ने दस्तखत करने से इंकार कर दिया। दया पवार रेलवे में काम करते थे। सरकारी कर्मचारी होने के नाते वे नियमों से बंधे हुए थे। प्रहाद चेंदवणकर, ढुलमुल प्रकृति के थे। उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। अंततः राजा ढाले, नामदेव ढसाल, अर्जुन डांगले, भीमराव शिरवाले, उमाकांत रणधीर, गंगाधर पानतावणे, वामन निम्बालकर, मोरेश्वर वाहने और मैंने वक्तव्य पर हस्ताक्षर किये। बाबुराव बागुल और दया पवार ने वक्तव्य में शामिल इस वाक्य के कारण दस्तखत करने से इंकार कर दिया-“अगर सरकार दलितों पर अत्याचार और उनके साथ हो रहे अन्याय को नियंत्रित करने में असफल रहती है, तो हम कानून को अपने हाथों में लेंगे।” इसमें हिंसा या राज्य के विरुद्ध युद्ध छेडने की बात नहीं कही गई थी। पुलिस अधिकारी इस वक्तव्य को पढ़ते और यह जानकर कि हस्ताक्षरकर्ता लेखक हैं, उसे कचरे के डिब्बे में फेंक देते। बाबुराव बागुल और दया पवार ने इस तथ्य के बावजूद हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। इससे मेरे मन में उनके प्रति सम्मान में कमी आई। महाराष्ट्र में सन् 1972 में दलितों पर अत्याचार की दो घटनाओं ने दलित युवकों को आगबबूला कर दिया। पहली घटना पुणे जिले के बावडा गांव में हुई, जहां ग्रामवासियों ने दलितों का बहिष्कार कर रखा था। बहिष्कार का आह्वान, शहाजीराव पाटिल ने किया था। उनके भाई शंकरराव पाटिल राज्य मंत्री थे। इसके बाद यह मांग उठी कि इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए, शंकरराव को मंत्री पद से इस्तीफा देना चाहिए। इसी बीच महाराष्ट्र के परभणी जिले के ब्राह्मणगांव (ब्राह्मणों के गांव) में दो दलित महिलाओं को नंगा कर घुमाया गया। उनका अपराध यह था कि वे अपनी प्यास बुझाने के लिए ‘ऊंची’ जातियों के कुएं की ओर जा रही थीं। वे घूंट भर पानी भी पी पातीं, उसके पहले ही जातिवादी गांव वालों ने उन्हें देख लिया और उन्हें न केवल नंगा कर गांव में घुमाया वरन उनके नंगे बदन पर बबूल की कांटेदार झाड़ियां भी फेंकी। अनेक संगठनों ने इस घटना की निंदा की। मुंबई के वरली में एक बैठक आयोजित की गई। इसकी अध्यक्षता करते हुए, बाबुराव बागूल ने दलित युवको का आह्वान किया कि वे इस तरह के अत्याचारों के विरुद्ध लडने के लिए उठ खड़े हों। परंतु उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे किसी संघर्ष में वे सक्रिय भूमिका नहीं निभाएंगे और न ही किसी ज्ञापन पर हस्ताक्षर करेंगे। हाथों में मशाले लिए हुए युवकों ने 27 मई को चेम्बूर पुलिस थाने तक मार्च निकाला। वी.एम. कदम, रतन सालवे, प्रोफेसर यादवराव गांगर्डे और डी.एस. राजगुरु ने मार्च का नेतृत्व किया। उन्होंने चीफ इंस्पेक्टर सुरेश माथुरे को एक ज्ञापन सौंपा। युवक क्रांति दल नामक एक संगठन के लगभग 25 युवकों ने सचिवालय के समक्ष धरना दिया। इनमें प्रमुख रूप से हुसैन दलवाई, सुभाष पवार और हीरालाल मुणगेकर जैसे लोग थे। दलितों पर बढ़ते अत्याचारों के लिए प्रदर्शनकारियों ने कांग्रेस को दोषी ठहराया। युवक आघाडी के नेताओं ने 28 मई को मुख्यमंत्री वसंतराव नाईक से मुलाकात कर उन्हें एक ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में कहा गया था कि महाराष्ट्र देश का एक प्रगतिशील राज्य है। इसके बावजूद, उनके नेतृत्व वाली सरकार के शासन में सुल्तानपुर, बेलगांव, लोनगांव, बावडा और ब्राह्मणगांव सहित राज्य के कई हिस्सों में बौद्धों पर अत्याचार हो रहे हैं। प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री से मांग की कि इन घटनाओं की न्यायिक जांच होनी चाहिए, ताकि दोषियों को सजा मिल सके और इन वर्गों की सुरक्षा के लिए एक विशेष शासकीय तंत्र बनाया जाना चाहिए। ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने वालों में राजा ढाले, चिंतामण जावले, वसंत कांबले, भगवान झरेकर और विनायक रंजने शामिल थे मधुकर धीव्वार, सुधाकर हलवादकर और अर्जुन डांगले जैसे अन्य लोगों के नाम इसमें शामिल थे. परंतु इन लोगों ने उस पर हस्ताक्षर नहीं किए। मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया कि युवक आघाडी को प्रभावित गांवों में अपने प्रतिनिधि भेजकर घटनाओं की सही-सही जानकारी एकत्रित कर उन्हें रिपोर्ट सौंपनी चाहिए। – मुख्यमंत्री ने कहा कि यद्यपि न्यायिक जांच अक्सर सच तक नहीं पहुंच पाती, परंतु वे इन घटनाओं की न्यायिक जांच करवा लेंगे और दोषियों के खिलाफ कार्यवाही करने से पहले दोनों रिपोर्टों की तुलना करेंगे। मैं युवक आघाडी का सदस्य नहीं था, परंतु मैं उसके प्रतिनिधिमंडल के साथ मुख्यमंत्री से मिलने गया था। मुलाकात के बाद, वडाला स्थित सिद्धार्थ विहार हॉस्टल में बैठक का आयोजन किया गया। भगवान झरेकर और राजा ढाले, विद्यार्थी थे। ये लोग सिद्धार्थ विहार हॉस्टल में रहते थे। नामदेव ढसाल और मैंने मुख्यमंत्री के इस सुझाव को खारिज कर दिया कि हम पीड़ितों से मिलकर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करें। हमारा मानना था कि इस काम के लिए सरकार के पास मशीनरी और गुप्तचर तंत्र है। हमारा तर्क था कि घटनाओं की जांच करना और अपने निष्कर्षों को सरकार को बताना हमारा काम नहीं है। हम दोनों ने इस मुद्दे पर बैठक का बहिष्कार कर दिया। ढसाल और मैं एक ही इलाके में रहते थे। ढसाल का घर जयराज भाई लेन में था। हालांकि यह नाम केवल नगर निगम के रिकॉर्ड में था। जयराज लेन को लोग, वहां बनने और बिकने वाले कबाबों की वजह से उस इलाके को ढोर चाल के नाम से जानते थे। उसे नवाब चाल भी कहा जाता था। पोस्टमैनों के अलावा, इस इलाके का सही नाम बहुत कम लोग जानते थे। ‘ढोर’ का अर्थ होता है मवेशी। इस शब्द का इस्तेमाल एक जाति विशेष के लिए किया जाता था। यह अत्यंत अपमानजनक था। मैं ढसाल के घर के नज़दीक, कमाठीपुरा की फर्स्ट लेन में म्युनिसिपल सफाई कर्मियों को आवंटित घर में रहता था। उसे सिद्धार्थ नगर के नाम से जाना जाता था। ढसाल और मैं लगभग रोज़ मिलने थे। उनकी कविताओं का पहला श्रोता मैं ही होता था। मेरे घर में सुबह मुझसे मिलने के बाद भी, वे अक्सर मेरे कार्यालय आ जाते थे। मेरे घर की रोटियां और कैंपस कार्नर में स्थित ‘आप की दुकान’ रेस्टोरेंट की दाल हमारा लंच हुआ करती थी। यह सिलसिला तब तक चलता रहा, जब तक कि मेरा दफ्तर चरनी रोड पर नहीं चला गया। एक दिन सिद्धार्थ विहार से लौटते वक्त हमने सोचा कि दलितों पर अत्याचार करने वालों को सबक सिखाने के लिए क्यों न हम एक भूमिगत आंदोलन शुरू करें। हमने तय किया कि हम पीड़ितों से मिलेंगे और उनके पीड़कों से तुरत-फुरत निपटेंगे। परंतु इसमें एक समस्या थी और वह यह कि हमारा समाज इस तरह के आंदोलनों को समर्थन नहीं देता और वह हम पर उल्टा पड़ जाता। इसके अलावा हम चर्चा में रहने के आदी हो गए थे। इसके बाद कुछ समय तक हमनें कुछ भी नहीं किया। मैं हमेशा ही गर्मियों के अप्रैल और मई महीनों में बीमार पड़ जाता था। जब मैं नवीं क्लास में था, तभी से में काम और पढ़ाई दोनों एक साथ करता आ रहा था। उस साल के अप्रैल में भी मुझे टाइफाइड हो गया और मुझे पूरी तरह से आराम करने की सलाह दी गई। मैंने इस समय का उपयोग अखबार पढने में किया। फरवरी 1972 में मैंने मुंबई टेलीफोन विभाग से इस्तीफा देकर, बैंक ऑफ़ इंडिया में नौकरी कर ली। यह इसलिए संभव हो सका, क्योंकि 1969 में इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था। मैं एमए की परीक्षा की तैयारी कर रहा था। परंतु मेरी बीमारी और दलित आंदोलन में मेरी व्यस्तता के चलते में परीक्षा नहीं दे सका। अंततः स्नातकोत्तर डिग्री हासिल कर शिक्षा के क्षेत्र में अपना करियर शुरू करने का विचार त्यागकर मैंने आम्बेडकरवादी आंदोलन से जुड़ने का निर्णय किया। सन् 1972 की 29 मई को मैंने काम शुरू कर दिया। एक दिन ढसाल मेर घर आये। टाइफाइड से मुक्ति पाए मुझे बहुत दिन नहीं हुए थे और मझे कमजोरी महसूस हो रही थी। हम विट्ठलभाई रोड पर अलंकार सिनेमा से होते हुए ओपेरा हाउस पहुंचे। वहां हमने मौसंबी का रस पिया। पैदल चलते-चलते हम दलितों पर अत्याचार से मुकाबला करने के लिए एक जुझारू संगठन बनाने की सम्भावना पर चर्चा कर रहे थे। हमने इस संगठन के लिए कई नाम सोचे और अंततः ‘दलित पँथर’ को चुना। इस तरह, दलित पैंथर का जन्म तब हुआ, जब हम मुंबई की एक सड़क पर पैदल चल रहे थे। और उसने सड़कों पर उत्तर कर अपनी लड़ाई लड़ी ! संगठन बनाने के निर्णय के बाद अगला कदम इसकी घोषणा करना था। हसाल की समाजवादी आंदोलन में सक्रिय लोगों से अच्छी मेल-मुलाकात थी। इस आंदोलन की श्रमिक शाखा का दफ्तर, मेरे कार्यालय के नज़दीक राजा राममोहन रॉय रोड पर था। हम उस दफ्तर में टाइपिस्ट रमेश समर्थ से मिले। मैंने रमेश की कविताओं का संकलन लखलखत्या भाकरी (चमकती हुई रोटी) पढ़ा था। मैं उसे जानता था। रमेश ने दलित पैंथर के गठन की घोषणा करते हुए प्रेस वक्तव्य टाइप किया। पहले ढसाल और फिर मैंने उस पर दस्तखत किये। ढसाल ने वक्तव्य की प्रतियां अख़बारों और पत्रिकाओं के दफ्तरों में पहुंचाईं। नवा काल, नव शक्ति, संध्याकाल और मराठा ने उसे छापा। उसे दैनिकों में प्रमुखता नहीं मिली। क्योंकि पत्रकारों और पुलिस, दोनों को लगा कि यह एक और छोटा-मोटा संगठन है। कोई भी व्यक्ति या संगठन अकेले कुछ नहीं कर सकता। उसे एक मजबूत नींव पर खड़ा होना होता है, उसे दिग्गजों के कन्धों का सहारा चाहिए होता है। डॉ. आंबेडकर, बुद्ध और जोतीराव फुले के कंधों पर खड़े थे। बाबासाहेब की मृत्यु के बाद आंबेडकरवादी आंदोलन उनकी रखी नींव पर खड़ा हुआ। हमने उनकी विरासत आंबेडकरवादियों की पुरानी पीढ़ी से उत्तराधिकार में पाई थी और हम कुछ अलग करना चाहते थे। दलित पैंथर के गठन के बाद, हमने एक रैली आयोजित करने का निर्णय लिया। मैंने एक बयान जारी किया, जिसमें कहा गया था- “महाराष्ट्र में जातिगत पूर्वाग्रह बेलगाम हो गए हैं और धनी किसान, सत्ताधारी और ‘ऊंची’ जातियों के गुंडे जघन्य अपराध कर रहे हैं। इस तरह के अमानवीय जातिवादी तत्वों से निपटने के लिए मुंबई के विद्रोही युवकों ने एक नए संगठन ‘दलित पँथर’ की स्थापना की है।   Q: दलित पैंथर पुस्तक का को किसने लिखा है ? A: दलित पैंथर पुस्तक का हिंदी संस्करण “दलित पैंथर” है, जिसे जे. वी. पवार (JV Pawar) ने लिखा है। यह पुस्तक आंदोलन की उत्पत्ति, विचारधारा और गतिविधियों का प्रत्यक्ष विवरण देती है। Q: दलित पैंथर कहाँ से खरीद सकते हैं ? A: यह पुस्तक https://shoppersstore.net पर पेपरबैक प्रारूप में उपलब्ध है।
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