Gulamgiri jyotiba Phule | Buy Gulamgiri Book Hindi | 60% Off
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Description Gulamgiri ग़ुलामगिरी (Gulamgiri jyotiba phule) ज्योतिबा फुले द्वारा 1873 में लिखी गई एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। यह किताब भारत में जाति व्यवस्था, ब्राह्मणवाद और सामाजिक असमानताओं पर कड़ा प्रहार करती है। पुस्तक का सारांश ग़ुलामगिरी Gulamgiri का शाब्दिक अर्थ है “ग़ुलामी” या “दासत्व”। इस पुस्तक में ज्योतिबा फुले ने ब्राह्मणवाद की आलोचना की और इसे भारतीय समाज में जातिगत शोषण और दमन का प्रमुख कारण बताया। उन्होंने इस किताब को अमेरिका में गुलामी के उन्मूलन (Abolition of Slavery) के संघर्ष के सम्मान में समर्पित किया था। मुख्य विषयवस्तु आर्य आक्रमण और जातिवाद फुले ने इस पुस्तक में यह तर्क दिया कि भारत में ब्राह्मणों द्वारा आर्य आक्रमण हुआ, जिसके कारण मूल निवासी शूद्रों और अति-शूद्रों को दास बना दिया गया। उन्होंने वर्ण व्यवस्था को शोषण का हथियार बताया। ब्राह्मणवादी पौराणिक कथाओं की आलोचना उन्होंने हिंदू धर्मग्रंथों में वर्णित भगवानों और मिथकों की व्याख्या एक नए दृष्टिकोण से की। रामायण और महाभारत में वर्णित घटनाओं को दलितों और पिछड़े वर्गों के शोषण से जोड़ा। ब्राह्मणों द्वारा फैलाई गई मानसिक गुलामी फुले ने तर्क दिया कि ब्राह्मणों ने धर्म और शिक्षा को अपने नियंत्रण में रखकर दलितों और शूद्रों को मानसिक रूप से गुलाम बना दिया। धर्म का उपयोग कर उनके आत्मविश्वास को तोड़ने का प्रयास किया गया। शूद्रों और अति-शूद्रों की मुक्ति का आह्वान उन्होंने पिछड़े वर्गों से आह्वान किया कि वे शिक्षा ग्रहण करें और सामाजिक अन्याय के खिलाफ खड़े हों। फुले ने “सत्यशोधक समाज” की स्थापना की ताकि दलितों और पिछड़ों को सामाजिक न्याय दिलाया जा सके। ग़ुलामगिरी Gulamgiri की ऐतिहासिक और सामाजिक प्रासंगिकता यह किताब भारत में सामाजिक सुधार और दलित चेतना का आधार बनी। बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर सहित कई अन्य समाज सुधारकों ने इस पुस्तक से प्रेरणा ली। आज भी यह पुस्तक बहुजन आंदोलन और सामाजिक न्याय के लिए संघर्षरत लोगों के लिए मार्गदर्शक है। लेखक: महात्मा ज्योतिबा फुलेप्रकाशन वर्ष: 1873भाषा: मराठी (बाद में कई भाषाओं में अनुवादित)मुख्य विषय: जाति प्रथा, ब्राह्मणवाद, सामाजिक शोषण और दलितों की मुक्ति परिचय ग़ुलामगिरी Gulamgiri महात्मा ज्योतिबा फुले की सबसे प्रभावशाली और क्रांतिकारी पुस्तकों में से एक है। यह पुस्तक भारतीय समाज में जातिगत भेदभाव, शोषण और ब्राह्मणवादी वर्चस्व के खिलाफ एक सशक्त तर्क प्रस्तुत करती है। फुले ने इस पुस्तक में विस्तार से बताया है कि किस प्रकार ब्राह्मणों ने धर्म और पौराणिक कथाओं के माध्यम से शूद्रों और अति-शूद्रों (आज के दलित, बहुजन और पिछड़े वर्ग) को सदियों तक मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से गुलाम बनाए रखा। पुस्तक लिखने का उद्देश्य भारत में व्याप्त सामाजिक अन्याय को उजागर करना। ब्राह्मणवादी षड्यंत्र को समझाना जिसने शूद्रों को शिक्षा, आर्थिक उन्नति और राजनीतिक शक्ति से दूर रखा। दलितों और पिछड़े वर्गों को अपने अधिकारों और आत्म-सम्मान के लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित करना। ब्राह्मणों द्वारा बनाए गए मिथकों और धर्मशास्त्रों की वैज्ञानिक व तार्किक व्याख्या करना। पुस्तक की प्रमुख विषयवस्तु 1. आर्य आक्रमण और जातिवादी शोषण फुले ने अपनी पुस्तक में तर्क दिया कि प्राचीन भारत में आर्य लोग बाहरी आक्रमणकारी थे, जिन्होंने मूल निवासियों (शूद्रों) पर आक्रमण कर उन्हें गुलाम बना लिया। आर्यों ने स्थानीय द्रविड़ और अन्य मूलनिवासी जातियों को दबाकर वर्ण व्यवस्था लागू की। ब्राह्मणों ने वेदों, पुराणों और अन्य धार्मिक ग्रंथों के माध्यम से इस शोषण को धर्म का रूप दे दिया। शूद्रों और अति-शूद्रों को ज्ञान और शक्ति से दूर रखा गया ताकि वे हमेशा अधीन बने रहें। 2. धर्म और पौराणिक कथाओं की पुनर्व्याख्या फुले ने हिंदू धर्मग्रंथों में वर्णित पौराणिक कथाओं और देवताओं की पूरी तरह से नई व्याख्या दी: रामायण और महाभारत जैसी कथाओं को ब्राह्मणों द्वारा गढ़ी गई कहानियां बताया गया, जिनका उद्देश्य शूद्रों और दलितों को मानसिक रूप से गुलाम बनाना था। राम को “आर्य आक्रमणकारी” बताया और रावण को “मूलनिवासी नायक” के रूप में प्रस्तुत किया, जो ब्राह्मणवाद के विरुद्ध लड़ा। उन्होंने विष्णु, शिव और अन्य देवताओं को भी ब्राह्मणों द्वारा बनाए गए काल्पनिक पात्र बताया, जिनका उद्देश्य समाज में शूद्रों को दबाकर रखना था। 3. ब्राह्मणवाद और मानसिक गुलामी ब्राह्मणों ने धर्म का उपयोग कर शूद्रों को यह विश्वास दिलाया कि वे निम्न जाति के हैं और उन्हें उच्च जातियों की सेवा करनी चाहिए। उन्हें शिक्षा और ज्ञान से वंचित रखा गया ताकि वे ब्राह्मणों की बातों को बिना किसी सवाल के मानते रहें। उन्होंने महिलाओं को भी धर्म के माध्यम से गुलाम बनाए रखा और उनके अधिकारों को सीमित कर दिया। 4. सत्यशोधक समाज और सामाजिक सुधार ज्योतिबा फुले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की, जिसका उद्देश्य सामाजिक भेदभाव को समाप्त करना था। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह और दलितों की शिक्षा को बढ़ावा दिया। फुले ने समाज को यह बताया कि ईश्वर ने सभी को समान बनाया है और कोई भी जाति जन्म से श्रेष्ठ या हीन नहीं हो सकती। 5. शिक्षा और आत्मनिर्भरता पर बल फुले ने इस पुस्तक में बताया कि शूद्रों को अपनी स्थिति सुधारने के लिए शिक्षा प्राप्त करनी होगी। उन्होंने कहा कि ब्राह्मणों द्वारा बनाए गए झूठे धार्मिक ग्रंथों को छोड़कर वैज्ञानिक और तार्किक शिक्षा को अपनाना चाहिए। आत्मनिर्भरता के लिए उन्होंने कृषि और व्यापार को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया। ग़ुलामगिरी Gulamgiri की ऐतिहासिक और सामाजिक प्रासंगिकता जाति प्रथा के खिलाफ संघर्ष: इस पुस्तक ने जाति-आधारित भेदभाव और सामाजिक असमानता के खिलाफ क्रांतिकारी आंदोलन की शुरुआत की। अंबेडकर और बहुजन आंदोलन पर प्रभाव: डॉ. बी.आर. अंबेडकर और कई अन्य दलित नेता इस पुस्तक से प्रेरित हुए और इसे दलित मुक्ति संग्राम का आधार माना। आज भी प्रासंगिक: आज भी भारत में जाति-आधारित भेदभाव मौजूद है, इसलिए यह पुस्तक सामाजिक न्याय और समानता की लड़ाई में महत्वपूर्ण बनी हुई है। बहुजन साहित्य का आधार: यह पुस्तक बहुजन साहित्य का एक महत्वपूर्ण स्तंभ मानी जाती है और सामाजिक जागरूकता बढ़ाने के लिए इसका अध्ययन आवश्यक है। महत्वपूर्ण उद्धरण (Quotes) – ग़ुलामगिरी Gulamgiri से “धर्म ने हमेशा कमजोरों का शोषण किया है, और ब्राह्मणों ने इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया।” “शूद्रों को शिक्षा से दूर रखकर उन्हें गुलाम बनाया गया, लेकिन अब समय आ गया है कि वे अपनी जंजीरें तोड़ें।” “यदि शूद्रों को मुक्ति पानी है, तो उन्हें खुद अपने अधिकारों के लिए लड़ना होगा।”
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