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Ambedkar ki Najar me Gandhi aur Gandhivad

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Description Ambedkar ki Najar me Gandhi aur Gandhivad | अम्बेडकर की नजर में गांधी और गांधीवाद श्री गांधी से सावधान : अछूत क्या कहते हैं? अछूत क्या कहते हैं ? गांधी से सावधान ! (डॉ. आंबेडकर का यह लेख उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘ह्वाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबिल्स’ का दसवां अध्याय है। इस अध्याय का शीर्षक ‘बीवेयर ऑफ मिस्टर गांधी’ था। यह पुस्तक सन् 1945 में प्रकाशित हुई थी। यह ‘डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज’ के नवें खंड में संकलित है। इसमें डॉ. आंबेडकर ने गांधी के पूरे जीवन, व्यक्तित्व, विचारों एवं कार्यों का आकलन किया है। इस अध्याय में उन्होंने विशेष तौर पर छुआछूत प्रथा के प्रति गांधी का नजरिया क्या रहा है, इसका विस्तार से वर्णन किया है और समय-समय पर उसमें क्या परिवर्तन आए, उसे भी रेखांकित किया है। इसके साथ ही डॉ. आंबेडकर ने गांधी और उनके नेतृत्व में कांग्रेस द्वारा छुआछूत प्रथा मिटाने के लिए किए गए कार्यों की असलियत को भी उजागर किया है और तथ्यों के साथ यह बताया है कि वास्तव में गांधी और कांग्रेस ने छुआछूत प्रथा मिटाने लिए भी कोई गंभीर प्रयास नहीं किया। जो कदम उठाए गए, वे सिर्फ दिखावे के लिए थे और ढकोसला थे। गांधी और कांग्रेस ने कैसे अछूतों के राजनीतिक अधिकारों के मार्ग में हर कदम पर बाधा खड़ी की, यह अध्याय इस पूरे घटनाक्रम को भी उजागर करता है।) कांग्रेस वाले अछूतों को यह पट्टी पढ़ाने में कभी संकोच नहीं करते कि केवल गांधी ही उनके संरक्षक हैं। कांग्रेसी भारत भर में घूम-घूमकर न केवल गांधी के अछूतों का असली संरक्षक होने का दावा करते हैं, बल्कि इससे भी आगे बढ़कर वे अछूतों को इस बात का यकीन दिलाते फिर रहे हैं कि गांधी ही उनके एकमात्र संरक्षक हैं। जब उन्हें इसका सबूत देने के लिए बाध्य किया जाता है, तो वे उदाहरण देते हैं कि यदि अछतों के अधिकारों के लिए आज तक किसी ने आमरण अनशन करके प्राणों की बाजी लगाई है, तो वह हैं केवल गांधी: दूसरा कोई नहीं। दरअसल, वे बेझिझक अछूतों की आंखों में धूल झोंकते हुए कहते हैं कि पूना पैक्ट के अंतर्गत अछूतों को जो भी राजनीतिक अधिकार मिले हैं, वे गांधी के प्रयत्नों का ही फल है। ऐसे प्रचार के उदाहरण के तौर पर मैं राय बहादुर मेहर चंद खन्ना का यह बयान पेश करता हूं, जो उन्होंने पेशावर में 12 अप्रैल, 1945 को दलित वर्ग संघ के तत्वावधान में हई अछूतों की सभा में दिया था’- “तुम्हारे सबसे अच्छे मित्र महात्मा गांधी हैं, जिन्होंने तुम्हारे अधिकारों के लिए अनशन किया और पूना पैक्ट के अंतर्गत मताधिकार तथा स्थानीय निकायों और विधान मंडलों में प्रतिनिधित्व का अधिकार दिलाया। मैं जनता हूं कि आप में से कुछ लोग डॉ. आंबेडकर के पीछे दौड़ रहे हैं, जिन्हें साम्राज्यवादी ब्रिटिश सरकार ने खड़ा किया है और जो ब्रिटिश साम्राज्य के हाथ मजबूत करने के लिए आपका इस्तेमाल करते हैं ताकि अंग्रेज भारत में फूट डाल कर शासन करते रहें। मैं आप लोगों से अपील करता हूं कि यह समझें कि आपकी अपनी भलाई किस बात में है और स्वयंभू नेताओं और अपने वास्तविक शुभचिंतक मित्रों के बीच के फर्क को पहचानें।” यदि मैंने राय बहादुर मेहर चंद खन्ना का बयान उद्धृत किया है, तो इसलिए नहीं कि वह ध्यान देने योग्य है, वरन् इसलिए कि भारतीय राजनीति में उनसे ज्यादा गंदगी फैलाने वाला और कोई नहीं है। एक ही वर्ष के अंदर, वर्ष 1944 के साल में ही, खन्ना ने सफलतापूर्वक तीन अलग-अलग भूमिकाएं निभाई। उन्होंने हिंदू महासभा के सचिव के रूप में अपना कार्य आरंभ किया, फिर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के दलाल बने और समुद्र पार अंग्रेजों और अमरीकियों को विश्वयुद्ध के लिए भारत द्वारा किये जा रहे प्रयासों से अवगत कराने गए और अब वह पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में कांग्रेस के गर्गे के रूप में कार्य कर रहे हैं। राय बहादुर खन्ना जैसे आदमी के बारे में मैं ड्राइडन की भाषा में कहना चाहूंगा गांधीवाद : अस्पृश्यों की तबाही डॉ. आंबेडकर का यह लेख उनकी पुस्तक ‘ह्वाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबिल्स’ का ग्यारहवां अध्याय है। यह किताब ‘डॉ. बाबा साहेब भांबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज’ के नवें खंड में संकलित है। सामान्यतया यह माना जाता है कि दलितों की समस्याओं को हल करने के ससंबंध में गांधी और आंबेडकर के दृष्टिकोण एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आज भी इसी तरह का वैचारिक आख्यान स्थापित करने का प्रयास सवर्ण बुद्धिजीवियों द्वारा किया जाता है। जबकि सच्चाई इसके विपरीत है। सवर्ण बुद्धिजीवियों के भ्रमित होने के दो वस्तुनिष्ठ कारण हैं। पहला कारण है कि उन्होंने डॉ. आंबेडकर के विपुल साहित्य का अध्ययन नहीं किया है। वे डॉ. आआंबेडकर के व्यक्तित्व, कृतित्व और विचारों को केवल ‘अस्पृश्यों के अधिकारों के लिए संघर्ष’ तक सीमित कर देते हैं। दूसरा सबसे बड़ा कारण सभी विचारधारा के अधिकांश बुद्धिजीवियों का अपने विचार, आचार और व्यवहार में वेदांती होना है। यहां तक कि वामपंथी बुद्धिजीवियों का भी बड़ा हिस्सा अपने आपको वेद पर विश्वास न करने वाली विचारधारा चार्वाक, आजीवक और बौद्ध परंपरा से नहीं जोड़ता है। डॉ. आंबेडकर, गांधी के विचारों के प्रबल विरोधी थे। उन्होंने इस अध्याय में गांधीवाद के सभी बुनियादी तत्वों पर विचार किया है और उसे तथ्यों एवं तकों के साथ खारिज किया है और उसे आधुनिक भारत के निर्माण के लिए अनुपयोगी पाया है। डॉ. आंबेडकर ने न केवल अस्पृश्यता के निवारण जैसे विषय पर गांधी से असहमति जतायी, बल्कि स्वतंत्र भारत के पुनर्निर्माण जैसे प्रश्नों पर भी वे गांधी के विचारों से पूरी तरह असहमत थे। अंग्रेजी में लिखित इस लेख ‘गांधीज्म’ का उपशीर्षक डॉ. आंबेडकर ने ‘दी डूम ऑफ दी अनटचेबिल्स’ दिया है। इसका भावार्थ है ‘अस्पृश्यों की भयानक तबाही जिसे रोका नहीं जा सकता।’ चूंकि गांधीवाद भारत के पुनर्निर्माण बात करता है इसलिए डॉ. आंबेडकर ने गांधीवादी भारत अछूतों के लिए कैसा होगा, इसको उपशीर्षक में सूत्रबद्ध किया है। इसके साथ ही डॉ. आंबेडकर ने इस लेख में गांधीवादी दर्शन की अव्यवहारिकता एवं खोखलेपन को भी उजागर किया है।)    भारतीय लोग भारत के सामाजिक और आर्थिक जीवन के पुनर्निर्माण की है। बात करते हुए अभी तक व्यक्तिवाद बनाम सामूहिकतावाद, पूंजीवाद बनाम समाजवाद, रुढिवाद बनाम आमूलचूल परिवर्तनवाद जैसे वादों पर बात करते रहे हैं, परंतु हाल में भारतीय क्षितिज पर एक नए ‘वाद’ का अभ्युदय हुआ है। इसे गांधीवाद कहते हैं। यह सच है कि हाल ही में गांधी ने गांधीवाद जैसे किसी वाद के अस्तित्व से इंकार किया था। गांधी का यह इंकार उनके द्वारा धारण की गई साधारण विनम्रता से अधिक कुछ नहीं कहा जा सकता। परंतु इससे गांधीवाद का अस्तित्व झुठलाया नहीं जा सकता। अच्छी-खासी संख्या में गांधीवाद शीर्षक वाली पुस्तकें लिखी गई हैं, जिनका प्रतिवाद गांधी ने कभी नहीं किया। गांधीवाद की ओर भारत तथा अन्य देशों के काफी लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ है। कुछ लोगों को तो इसमें इतना विश्वास है कि वे गांधीवाद को मार्क्सवाद का विकल्प तक मानने से नहीं हिचकते। आगे जो कुछ मैं लिखने जा रहा हूं उस पर गांधीवाद के अनुयायी यह तर्क प्रस्तुत कर सकते हैं कि संभव है कि गांधी ने अस्पृश्यों के लिए उतना काम नहीं किया हो, जितना कि अस्पृश्य उनसे अपेक्षा करते रहे हों, परंतु क्या गांधीवाद उन्हें कोई उम्मीद नहीं देता? गांधीवाद के अनुयायी मुझ पर आरोप लगा सकते हैं कि अस्पृश्यों के विषय में गांधी द्वारा कभी-कभार उठाए गए छोटे कदमों के गडे मुर्दे उखाड़कर मैं उनके द्वारा प्रतिपादित महत्वपूर्ण सिद्धांतों की अनदेखी कर रहा हूं। मैं यह मानने के लिए तैयार हूं कि कभी-कभी ऐसा होता है कि जो मनुष्य किसी बडे सिद्धांत का प्रतिपादन करता है, वह जमीन पर कोई छोटा ही कदम उठा पाता है तो उसे उसके लिए क्षमा किया जा सकता है. इस आशा से कि किसी दिन वह सिद्धांत अपनी स्वाभाविक गतिकी के तहत उन सारी चीजों को भी अपने दायरे में समेट लेगा जो कभी छूट गई थी। गांधीवाद अध्ययन की दृष्टि से अपने आप में काफी रोचक विषय है। कम्युनल अवार्ड के खिलाफ गांधी के आमरण अनशन के निर्णय पर आंबेडकर का वक्तव्य   (यह आलेख ‘बाबा साहेब आंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज’ के नवें खंड में संकलित है। भारत में संवैधानिक लोकतंत्र की स्थापना की दिशा में ब्रिटिश सरकार द्वारा गोलमेज सम्मेलनों के बाद 17 अगस्त, 1932 को घोषित किया गया ‘कम्युनल अवार्ड’ आधुनिक भारतीय इतिहास की एक युगांतरकारी घटना थी। यह डॉ. आंबेडकर के सार्वजनिक जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। इसमें डॉ. आंबेडकर के विचारों के अनुरूप भारतीय लोकतंत्र की रूपरेखा को व्यवहारिक रूप देने का प्रयास किया गया था। यह एक क्रांति थी, जिसे गांधी ने ‘पूना पैक्ट’ के माध्यम से प्रतिक्रांति में परिवर्तित कर दिया।   डॉ. आंबेडकर के लिए 17 अगस्त, 1932 से 24 सितंबर, 1932 के बीच का समय अप्रत्याशित रूप से बहुत तनावपूर्ण था। कम्युनल अवार्ड में भारतीय ईसाइयों, एंग्लो इंडियन, यूरोपीय, मुस्लिम और सिख समुदायों के साथ अछूतों को भी पृथक निर्वाचक मंडल का अधिकार स्वीकृत किया गया था। इसके साथ ही जमींदारों, मजदूरों और व्यापारियों को भी पृथक निर्वाचक मंडल का अधिकार दिया गया। लेकिन गांधी ने अछूतों से पृथक निर्वाचक मंडल का अधिकार छीनने के लिए आमरण अनशन प्रारंभ कर दिया। गांधी को आमरण अनशन न करने के लिए तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्से मॅक्डोनाल्ड ने महात्मा गांधी को पत्र लिखा जिसमें गांधी की आपत्तियों का निवारण बड़ी स्पष्टता के साथ किया गया था। लेकिन गांधी नहीं माने। 19 सितंबर, 1932 को डॉ. आंबेडकर ने भी कम्युनल अवार्ड पर अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए बयान जारी किया। इसमें उन्होंने कम्युनल अवार्ड में अछूतों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल के विरोध में गांधी द्वारा जान की बाजी लगाने को औचित्यहीन करार दिया और गांधी के जीवन तथा अछूतों के अधिकारों में से एक को चुनने के लिए आंबेडकर को बाध्य न करने का अनुरोध किया। लेकिन गांधी नहीं माने।)   ब्रिटिश सरकार ने स्वेच्छा से या जनमत के दबाव में आकर अकृत समाज को स्वतंत्र मतदाता संघ का जो हक दिया है, उसका गांधी ने सख्त विरोध किया है। उन्होंने यह प्रतिज्ञा की है कि ब्रिटिश सरकार घोषित रूप में इसे वापस नहीं लेती है तो “मैं आमरण अनशन करके अपनी जान कुर्बान कर दूंगा। उनकी इस प्रतिज्ञा को सुनकर मुझे बेहद आश्चर्य हुआ। गांधी द्वारा किये गये आत्महत्या के संकल्प से उन्होंने मुझे विरोधी और मुश्किल स्थिति में डाल दिया है। इसमें मेरी कितनी बड़ी जिम्मेदारी है, इस बात की कल्पना कोई आसानी से कर सकता है।   गांधी गोलमेज सम्मेलन में यह कह रहे थे कि जाति संबंधी निर्णय का सवाल अन्य सवालों की तुलना में मामूली है। फिर उनकी राय में ‘मामूली’ सवाल के लिए उन्हें अपनी जान की बाजी क्यों लगानी चाहिए, यह बात आज तक मेरी समझ में नहीं आई है। गांधी की नजर रखने वाले लोगों की भाषा में कहें तो कम्युनल अवार्ड हिंदुस्तान के संविधान की किताब का एक अध्याय ना होकर केवल एक परिशिष्ट है। इस जाति विशेष का सवाल उस किताब का प्रमुख महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं समझा जाता। हिंदुस्तान को सम्पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता मिलनी चाहिए इस बात पर गांधी ने गोलमेज सम्मेलन में कितना बल दिया था और इस बात का कितना आग्रह किया था! इस तरह को राजनीतिक स्वतंत्रता के महत्वपूर्ण सवाल के लिए गांधी ने यदि अपनी जान की बाजी लगा दी होती तो वह उचित होता। लेकिन राजनीतिक स्वतंत्रता जैसे उनकी राय में बड़े महत्वपूर्ण सवालों को वहीं छोड़कर अछूतों के मतदान के एक मामूली सवाल को उन्होंने जानबूझकर उठाया और उसका बहाना करके अपनी जान की बाजी लगाने की बात कही, यह कहाँ तक उचित है? गांधी का यह बर्ताव त्रस्त करने वाले अचंभे का एक उत्तेजक और खेदजनक नमूना है। स्वतंत्र मतदाता संघ अकेले अछूत समाज को ही मिला, ऐसी बात नहीं। इंडियन ईसाई, एंग्लो इंडियन्स, मुस्लिम, सिख आदि को भी स्वतंत्र मतदाता संघ दिये गये हैं। यही नहीं, जमींदार वर्ग, मजदूर वर्ग और व्यापारी वर्ग के लिए भी खास या स्वतंत्र मतदाता संघों की योजना बनाई गई है।   विश्वासघाती हैं गांधी (यह लेख साप्ताहिक ‘जनता’ के 26 नवंबर, 1938 के अंक में प्रकाशित हुआ। दरअसल, अहमदाबाद में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर आने वाले हैं, इस प्रकार का समाचार चारों ओर फैल गया था। इस समाचार को सुनकर कांग्रेस के लोग बड़े बेचैन हो गये थे। उन्होंने डॉ. आंबेडकर अहमदाबाद न आएं, इस बात का पूरा प्रयास किया। लेकिन डॉ. आंबेडकर 22, 23 अक्टूबर, 1938 को अहमदाबाद के दौरे पर आए। अहमदाबाद में गुजरात वर्नाकुलर सोसायटी के प्रेमभाई सभागार में दलित युवक मंडल की ओर से उनको सम्मान पत्र दिया गया था। इस सभा को संबोधित करते हुए डॉ. आंबेडकर ने यह भाषण दिया था। इस भाषण में उन्होंने गांधी पर विश्वासघात करने का आरोप लगाया था। यह आरोप शायद ही किसी ने गांधी पर लगाया हो। इसकी पृष्ठभूमि में गांधी द्वारा गोलमेज सम्मेलन और उसके बाद अछूतों के राजनीतिक अधिकारों के प्रति अपनाया गया रवैया था। इसकी विस्तृत चर्चा आंबेडकर ने इस लेख में की है। साथ ही गांधी की तुलना डॉ. आंबेडकर ने नेपोलियन से की है, जो गांधी की लोकतांत्रिक व्यक्तित्व की छवि को तार-तार कर देता है।)   मेरे ऊपर यह आरोप लगाया जाता है कि मैं गांधी का विरोधी हूं, मैं उन्हें नहीं मानता। यह बात बिल्कुल सही है। और इस बात को मैं गुजरात के इस मैदान में गांधीवाद के किले में आप सभी के सामने खुलेआम कह रहा हूं। यह कहते हुए मुझे कोई कठिनाई महसूस नहीं हो रही है। मैं इस बात को अच्छों तरह जानता हूं कि गांधी के विरोध में बोलना आसान नहीं है। आज करोड़ों लोग उन्हें अवतारी पुरुष मानते हैं। दुनिया के सामने वे हिंदुस्तान के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में विदेश जाते हैं। वे साधु, महात्मा समझे जा रहे हैं। क्या मुझे यह नहीं मालूम कि गांधी के चरणों में नाक रगड़कर ‘जी हुजूरी’ करने से कितनी भलाई है? सुभाषचंद्र बोस को ही लीजिए। सन् 1932 में विठ्ठलभाई पटेल के कान में उन्होंने गांधी के बारे में क्या कहा था? “   महात्मा गांधी की कानून तोड़ो आंदोलन को वापस लेने की बात सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ। महात्मा गांधी ने आज तक राष्ट्र की ओर से जो महत्वपूर्ण काम हुआ था उस पर कलम के एक झटके में कालिख पोत दी है। पिछले 13 सालों में विलक्षण स्वार्थ, त्याग और बलिदान करके हिंदी राष्ट्र ने अपने आंदोलन की जो सफलता हासिल की और इज्जत कमाई वह महात्मा जी के आंदोलन वापस लेने की घोषणा से पूरी तरह समाप्त हो गई है। मुझे अभी भी यह बात समझ नहीं आई कि इस तरह के आंदोलन को बीच में ही वापस लेने का उन्हें क्या अधिकार है? एक समय नेपोलियन ने कहा था, ‘आई ऍम दी स्टेट’ । मैं ही राज्य हूं।, आज गांधी लोगों को परोक्ष रूप से यही बनना चाहते हैं, ‘आई ऍम दी कांग्रेस’ [मैं ही कांग्रेस हूं। … सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस लेने का मतलब कांग्रेस का वर्तमान कार्यक्रम असफल हुआ, इस बात को कबूल करना है। महात्मा गांधी राजनीतिक नेता की दृष्टि से असफल हुए हैं, ऐसी मेरी अपनी राय है।”   गांधी के लिए ऐसी बात कहने वाले सुभाषचंद्र बोस कांग्रेस के सभापति हैं। यह परिवर्तन इसलिए हुआ कि उन्होंने बाद में गांधी-भक्ति का नकाब पहन लिया। चंदे के चार आने और सफेद टोपी के दो आने खर्च कर मैं कांग्रेस में गया तो वह सम्मान मुझे भी मिलेगा, यह बात मुझे अच्छी तरह मालूम है। किंतु ऐसे सम्मान को मैं ठोकर मारता हूं। मैं गांधी का विरोध क्यों करता हूं? मैं गांधी का जो विरोध कर रहा हूं वह मेरे अपने स्वार्थ के लिए नहीं है। यह महात्मा विश्वासघात करने वाला है, इसलिए मैं उसका विरोध करता हूं। उसके विश्वासघात के मेरे पास पर्याप्त प्रमाण हैं। इस बात का मुझे अपने कार्य में प्रत्यक्ष अनुभव भी हैं, इसलिए मैं उनका विरोध करता हूं और करता रहूंगा।   मैं आपको यह बताना चाहता हूं कि मैं गांधी को विश्वासघात करने वाला क्यों कहता हूं। गोलमेज सम्मेलन के लिए हिंदुस्तान के दलित वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में इंग्लैंड जाने से पहले मैं गांधी से मिला था। उस समय उन्होंने कहा या में अछूतों को स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र देने के विरोध में हूं। किंतु विस्तार से बात होने के बाद उन्होंने यह कबूल किया था कि अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के प्रतिनिधियों ने अछूतों की मांगें मान लीं तो मैं उनके खिलाफ नहीं जाऊँगा। क्या गांधी महात्मा हैं?   (डॉ. आंबेडकर का यह आलेख साप्ताहिक ‘चित्रा’ के अक्टूबर, 1938 के किसी एक अंक में प्रकाशित हुआ। इस लेख में उन्होंने ‘महात्मा’ शब्द की कसौटियों पर विचार किया है तथा गांधी को ‘महात्मा’ जैसे सम्मानजनक संबोधन के योग्य नहीं पाया है। किसी व्यक्ति को समाज द्वारा दिया गया सर्वोच्च सम्मानजनक सम्बोधन ‘महात्मा’ है। गांधी को यह उपाधि सर्वप्रथम रवीन्द्र नाथ टैगोर ने सन् 1915 में दी थी। हालांकि सन् 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत आगमन के पहले से ही उनके अनुयायियों ने मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा कहना प्रारंभ कर दिया था। सन् 1920 के कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में जिन्ना ने गांधी को मिस्टर गांधी कहकर संबोधित किया तो गांधी के अनुयायियों ने जिन्ना को अपमानित किया। जिन्ना उसके बाद कांग्रेस से अलग हो गये।)   इस सवाल से मुझे बड़ी नफरत हो रही है। इसके दो कारण हैं। मैं सभी महात्माओं से नफरत करता हूं। और मेरी यह मान्यता है कि सभी महात्माओं से मुक्ति पा लेनी चाहिए। उनका अस्तित्व किसी भी राष्ट्र के लिए कलंक है, क्योंकि ये लोग बुद्धि और बुद्धिवाद की जगह अंधश्रद्धा को प्रतिष्ठित करना चाहते हैं। दूसरी बात यह है कि लोग महात्मा शब्द का अर्थ क्या लेते हैं, इस बात को मैं नहीं जानता। इसलिए इस सवाल का जवाब देना मेरे लिए असंभव है। फिर भी ‘चित्रा’ के संपादक इस सवाल के जवाब के लिए अधिक आग्रह कर रहे हैं, इसलिए मैं उनका जवाब देने की पूरी कोशिश कर रहा हूं।   आम हिंदू आदमी की दृष्टि में किसी आवश्यक हैं- उसके कपडे, उसका शील और उसकी शिक्षा। इनमें कपड़ों भी महात्मा में तीन बाते होनी को ही यदि महात्मा की कसौटी मान ली जाय तो स्वयं के मोक्ष के लिए दूसरे के मुंह की ओर ताकने वाले अनपढ़ आदमी की राय में शायद मोहनदास गांधी महात्मा हो सकते हैं। भेष बदलकर महात्मा बन जाना भारत में बड़ा आसान है। सामान्य ढंग से जीवन जीने वाले सामान्य आदमी कितना भी अच्छा काम करे, तब भी उसके बारे में हिंदू समाज में किसी प्रकार के आदर की भावना पैदा नहीं होती। किंतु कोई सामान्य आदमी भला काम करने की बजाय यदि असामान्य मतलब गैर-जिम्मेदाराना ढंग से बर्ताव करने लगे तो उसकी वजह से संत बन जाता है. महात्मा बन जाता है. द्रष्टा बन जाता है। आप सूट-बूट या कोट-धोती आदि मामूली कपड़े पहनिए, आपकी ओर लोग आंख उठाकर नहीं देखेंगे। लेकिन आप दिगंबर बन जाइए, बाल बढ़ाइए, गंदा पानी पी लीजिए, लोग आपके कदमों में झुक जाएंगे। फिर भारत में गांधी ‘महात्मा’ बन गये, इसमें कौन-सा आश्चर्य है! अन्य किसी देश में इस तरह के महात्माओं को दीवाना कहकर लोगों ने उनका माखौल उड़ाया होता।   गांधी की शिक्षा के बारे में सोचा जाय तो वह दिखने में लुभावनी लगती है। सत्य और अहिंसा, ये बड़े महान सिद्धांत हैं। और गांधी उनका जयघोष आधुनिक दुनिया में बेहद जोर-शोर से कर रहे हैं। वे इन सिद्धांतों का उच्चारण कर रहे हैं, इस बात के लिए हिंदू समाज उनके पीछे क्यों दौड़ रहा है, इसका रहस्य मैं अभी तक समझ नहीं पाया हूं। अभिजात अज्ञानी आदमी के अलावा अन्य कोई भी गांधी की महानता को स्वीकार नहीं करेगा। मानवीय संस्कृति की रक्षा के लिए सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों की आवश्यकता है, इस बात को अब किसी को पुनः पढ़ाने की कोई वजह नहीं है। जैसाकि मैंने पहले कहा है, इस बात को सदियों पहले बुद्ध ने अच्छी तरह समझाया है। उसमें गांधी का नया कुछ भी नहीं है। उन्होंने सत्य और अहिंसा के प्रयोग के संबंध में बार-बार खड़े होने वाले रहस्यमयी सवालों पर यदि रोशनी डाली होती तो वे महात्मा की उपाधि के लायक सिद्ध हुए होते। और दुनिया भी उनकी हमेशा शुक्रगुजार होती। कब सत्य बोलना चाहिए, कब हिंसा को समर्थनीय मानना चाहिए, इन दो रहस्यों के जवाब की दुनिया बड़ी बेसब्री के साथ इंतजार कर रही है।   दृष्टि से किया जाना चाहिए। इस सवाल का जवाब ईसा मसीह ने किस ढंग से बुद्ध की शिक्षा के मुताबिक सत्य और अहिंसा सिद्धांतों का प्रयोग साध्य की दिया होता, इस बात को जानने के लिए हमारे पास कोई रास्ता नहीं है।    जाति के प्रश्न पर गांधी और आंबेडकर के बीच वाद-विवाद-संवाद   (दूसरे गोलमेज सम्मेलन में आमने-सामने तीखी बहस और कम्युनल अवार्ड पर संवाद के बाद यह तीसरा अवसर था जब गांधी और आंबेडकर के बीच वाद-विवाद अखबारों के माध्यम से हुआ। इस बहस का विषय डॉ. आंबेडकर की पुस्तक ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ (जाति का विनाश) थी। इस पुस्तक की सामग्री को डॉ. आंबेडकर ने सन् 1936 में जात-पात तोड़क मंडल के अनुरोध पर लाहौर में उनके वार्षिक सम्मेलन में अध्यक्षीय भाषण के लिए तैयार किया था, लेकिन आयोजन समिति ने डॉ. आंबेडकर के विचारों से सहमत न होने के कारण अधिवेशन स्थगित कर दिया। परिणामस्वरूप डॉ. आंबेडकर का भाषण नहीं हो पाया। इसके बाद डॉ. आंबेडकर ने इस भाषण को पुस्तक के रूप में ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ शीर्षक से अपने खर्च पर छपवा दिया। इसी पुस्तक में व्यक्त विचारों पर गांधी ने अपने अंग्रेजी साप्ताहिक पत्र ‘हरिजन’ में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। डॉ. आंबेडकर ने भी गांधी की आपत्तियों का जवाब दिया। इस पत्र व्यवहार से स्पष्ट हो गया कि गांधी हिंदू धर्म की रीढ़ वर्ण व्यवस्था और उसका समर्थन करने वाले धर्मशास्त्रों की रक्षा करना चाहते थे, जबकि डॉ. आंबेडकर हिंदू धर्मशास्त्रों की पवित्रता में लोगों का विश्वास ही जाति के बने रहने का मुख्य कारण मानते थे। इसलिए इन धर्मशास्त्रों को डाइनामाइट लगाकर उड़ाने की बात कही थी। इस वाद-विवाद-संवाद मे वर्ण व्यवस्था व हिंदू धर्मशास्त्रों की नये भारत के निर्माण में भूमिका पर गांधी और आंबेडकर दोनों का पक्ष स्पष्ट हो जाता है।)   डॉ. आंबेडकर का अभियोग – 1   पाठक इस तथ्य को याद करेंगे कि डॉ. आंबेडकर पिछली मई में लाहौर के जात-पात तोड़क मंडल के वार्षिक अधिवेशन की अध्यक्षता करने वाले थे। लेकिन वह सम्मेलन ही रद्द कर दिया गया, क्योंकि डॉ. आंबेडकर का व्याख्यान स्वागत समिति को स्वीकार्य नहीं था। किसी स्वागत समिति द्वारा अपने द्वारा ही चुने गये अध्यक्ष को इसलिए खारिज कर देना कि उसका व्याख्यान आपत्तिजनक हो सकता है. कितना औचित्यपूर्ण है, इस पर सवाल किया जा सकता है। समिति को पता था कि जाति और हिंदू शास्त्रों के बारे में डॉ. आंबेडकर के विचार क्या हैं। उसे यह भी पता था कि उन्होंने हिंदुत्व को छोड़ने का अडिग निर्णय कर लिया है। डॉ. आंबेडकर ने जो व्याख्यान तैयार किया था, उससे जरा-सा भी कम की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए थी। ऐसा लगता है कि समिति ने जनता को एक ऐसे आदमी के मौलिक विचारों को सुनने के अवसर से वंचित किया है, जिसने समाज में अपने लिए एक अनूठी स्थिति बनायी है। डॉ. आंबेडकर भविष्य में जिस रूप में भी सामने आएं, वे ऐसे व्यक्ति नहीं हैं, जो खुद को भूला दिया जाना गंवारा कर सकता है।   डॉ. आंबेडकर स्वागत समिति द्वारा पराजित होने वाले नहीं थे। उस व्याख्यान को अपने खर्च से प्रकाशित कर डॉ. आंबेडकर ने उसके अस्वीकरण का जवाब दिया है। उन्होंने इसका दाम आठ आना रखा है। मेरा सुझाव है कि इसे घटा कर वे दो आना नहीं, तो कम से कम चार आना कर दें।   कोई भी सुधारक इस व्याख्यान की उपेक्षा नहीं कर सकता। जो रुढिवादी हैं, वे इसे पढ़कर लाभान्वित होंगे। इसका मतलब यह नहीं है कि व्याख्यान में आपत्ति करने योग्य कुछ भी नहीं है। इसे सिर्फ इसलिए पढ़ना चाहिए कि इस पुर गंभीर आपत्ति की जा सकती है। डॉ. आंबेडकर हिंदुत्व के लिए एक चुनौती है। उनका पालन-पोषण हिंदू के रूप में हुआ है, एक हिंदू संरक्षक ने उनकी पढ़ाई-लिखाई का इंतजाम किया, तथाकथित सवर्ण हिंदुओं ने जो व्यवहार इनके और इनके लोगों के साथ किया है, उससे वे इतने नाराज हैं कि वे न केवल उन्हें, बल्कि उस हिंदू धर्म को ही छोडना चाहते हैं, जो डॉ. आंबेडकर की और सवर्ण हिंदुओं की साझा विरासत है। इस धर्म को मानने वालों के एक हिस्से से अपनी नाराजगी को उन्होंने उस धर्म के विरुद्ध मोड़ दिया है।   लेकिन इसमें अचरज की कोई बात नहीं है। आखिर किसी व्यवस्था या संस्था का मूल्य उसके प्रतिनिधियों के आचरण से ही आंका जा सकता है। इसके अलावा, डॉ. आंबेडकर ने पाया कि सवर्ण हिंदुओं के बड़े हिस्से ने न केवल अपने सधर्मियों के साथ, जिन्हें उन्होंने अस्पृश्य का दर्जा दिया, अमानवीय व्यवहार किया है, बल्कि उन्होंने अपना यह आचरण शास्त्रों की सत्ता पर आधारित माना है, और जब वे खोज करने लगे तो उन्होंने पाया कि अस्पृश्यता की उनकी घारणा का काफी आधार वहां मिलता है। व्याख्यान के लेखक ने अपने तीन-तरफा अभियोग अमानवीय व्यवहार, अमानवीय व्यवहार करने वालों द्वारा इसका औचित्य सिद्ध करना और बाद का यह आविष्कार कि इस औचित्य का आधार शास्त्रों में मौजूद है – के प्रमाणस्वरूप उद्धरण पर उद्धरण दिये हैं।   कोई भी हिंदू, जिसके लिए उसकी आस्था उससे बड़ी चीज है, इस अभियोग के महत्व को कम करके नहीं आंक सकता। अपनी इस नाराजगी में डॉ. आंबेडकर अकेले नहीं हैं। वे इनमें सबसे ज्यादा अडिग, विद्वान और योग्यतम व्यक्तियों में एक हैं। निश्चय ही वे ऐसे व्यक्ति हैं जो इस मामले में किसी से भी समझौता नहीं कर सकता। ईश्वर की कृपा है कि नेताओं की अग्रिम पंक्ति में वे एकदम अकेले हैं और अभी तक एक बहुत ही छोटे अल्पसंख्यक समूह के प्रतिनिधि हैं। लेकिन जो वे कहते हैं, वही बातें दलित वर्गों के बहुत-से नेताओं द्वारा भी, कम या ज्यादा उग्रता के साथ, कही जाती हैं। फर्क यही है कि ये, उदाहरण के लिए राव बहादुर एम.सी. राजा और दीवान बहादुर श्रीनिवासन, न केवल हिंदू धर्म को छोड़ने की धमकी नहीं देते, बल्कि हरिजनों के बहुत बड़े वर्ग के साथ जो शर्मनाक सुलूक किया जाता है, उसकी क्षतिपूर्ति के रूप में इसमें काफी गरमाहट पाते हैं।   लेकिन बहुत-से नेता हिंदू धर्म के दायरे में हैं, यह तथ्य डॉ. आंबेडकर की बातों का खंडन करने के लिए पर्याप्त नहीं है। सवर्णों को अपनी आस्था और अपने आचरण को ठीक करना होगा। सबसे बढ़कर, जो विद्वान हैं और सवर्ण समाज में जिनका असर है, उन्हें शास्त्रों की एक आधिकारिक व्याख्या करनी चाहिए।    गांधी के बारे में बीबीसी (रेडियो) को आंबेडकर का साक्षात्कार   (आधुनिक भारत के सबसे चर्चित एवं विश्वविख्यात भारतीय मोहनदास करमचंद गांधी, जिनको ‘महात्मा’ कहा जाता है, को उनके समकालीन डॉ. आंबेडकर ‘महात्मा’ नहीं मानते थे। डॉ. आंबेडकर, गांधी को सदैव ‘मिस्टर गांधी’ कहकर संबोधित करते थे तथा उन्हें केवल एक कुटिल राजनीतिज्ञ मानते थे। 26 फरवरी, 1955 को बीबीसी को दिए गए साक्षात्कार में डॉ. आंबेडकर ने गांधी के प्रति अपने विचारों को बड़ी ही स्पष्टता के साथ रखा है। वे गांधी को समाज सुधारक भी नहीं मानते थे। अपने एक भाषण ‘रानाडे, गांधी और जिन्ना’ में डॉ. आंबेडकर ने महापुरूष और समाज सुधारक जैसी उपाधियों के मानकों के विषय में चर्चा की है। डॉ. आंबेडकर की दृष्टि में गांधी वर्ण व्यवस्था के मूल्यों पर भारत का पुनर्निर्माण करना चाहते थे। वे ऊपर से उदारवादी दिखने के प्रयास करते थे, लेकिन अंदर से रुढिवादी थे।)   आंबेडकर : मैं मिस्टर गांधी से पहली बार सन् 1929 में मिला। यह मुलाकात हमदोनों के एक साझे मित्र के माध्यम से हुई। उन्होंने मिस्टर गांधी को मुझसे मिलने के लिए कहा। तो मिस्टर गांधी ने मुझे लिखा कि वे मुझसे मिलना चाहते हैं। फिर मैं उनके पास गया और उनसे मिला। यह सबकुछ गोलमेज सम्मेलन में जाने से ठीक पहले हुआ था। उसके बाद वे दूसरे गोलमेज सम्मेलन में शामिल हुए। वे पहले गोलमेज सम्मेलन में शामिल नहीं हुए थे। वे दूसरे गोलमेज सम्मेलन में 5-6 महीने रहे थे। आप जानते ही हैं, वहां मैं उनसे मिला भी और दूसरे गोलमेज सम्मेलन में उनका सामना भी किया। उसके बाद पूना समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद भी उन्होंने मुझे मिलने के लिए बुलाया। उस समय वे जेल में थे, लिहाजा मैं उनसे मिलने गया। मैं हमेशा कहता है, जब भी मैं उनसे मिला, एक प्रतिपक्ष की हैसियत से मिला। मुझे लगता है कि ज्यादातर अन्य लोगों की तुलना में मैं उन्हें बेहतर जानता हूं, क्योंकि उन्होंने मेरे ही सामने अपने असली जहरीले दांत खोले थे। मैं उस आदमी के भीतर तक झांक सकता था। आप जानते ही हैं कि आम तौर पर अन्य लोग उनके सामने उनके भक्तों की तरह जाते थे। ऐसे लोग उनका बाहरी रूप देखने के अलावा कुछ भी नहीं देख पाते थे। बाहरी तौर पर उन्होंने अपना बाना महात्मा के रूप में बना रखा था। लेकिन मैं उन्हें इंसान के तौर पर देखता था, विल्कुल उनके असली रूप में। इसलिए आप यह कह सकते हैं कि मैं उनसे जुड़े हुए अन्य सभी लोगों की तुलना में उन्हें ज्यादा बेहतर तरीके से समझता था।   साक्षात्कारकर्ता : समग्रता में आप गांधी और गांधीवाद का मूल्यांकन कैसे करते हैं?   आंबेडकर : हाँ ठीक है। मैं शुरू में ही आप को यह बता दूं कि मिस्टर गांधी में बाहरी दुनिया, विशेषकर पश्चिमी दुनिया जिस तरह दिलचस्पी लेती है, उसे देखकर मुझे काफी हैरानी होती है। यह बात मेरी समझ से परे है। जहाँ तक भारत का प्रश्न है, मेरी परख के लिहाज से वे भारत के इतिहास का एक अध्याय थे, वे युग निर्माता कभी नहीं रहे। यह मेरी अपनी व्यक्तिगत राय है। गांधी पहले ही इस देश के लोगों की स्मृति से ओझल हो चुके हैं। आपने देखा होगा, गांधी की स्मृति सिर्फ इसलिए बनी हुई, क्योंकि कांग्रेस वार्षिक तौर पर उनके नाम पर छुट्टियां करती है, या तो उनके जन्मदिन पर या किसी अन्य दिन, जो उनके जीवन से जुड़ा हुआ हो। हर साल एक सप्ताह का उत्सव होता है। स्वाभाविक है, इसके चलते वे लोगों की स्मृति में पुनर्जीवित हो जाते हैं। मेरी यह समझ है कि यदि इस कृत्रिम तरीके से उन्हें लोगों की स्मृतियों में जिलाया न जाता, तो गांधी कब के भूला दिए गए होते।   साक्षात्कारकर्ता : क्या आपको नहीं लगता कि उन्होंने परिदृश्य को बुनियादी तौर पर बदल डाला, आपके हिसाब से अम्बेडकर की नजर में गांधी और गांधीवाद क्या है? आंबेडकर : नहीं, बिल्कुल नहीं। वास्तव में, वह हमेशा दोहरा व्यवहार करते थे। वे दो अखबार निकालते थे, एक अंग्रेजी में ‘हरिजन’, जो पहले ‘यंग इंडिया’ था, और गुजरात में, एक अलग अखबार ‘हरिजन बंध’]… यदि आप गांधी के बारे में बीबीसी (रेडियो) को आंबेडकर का साक्षात्कार इन दोनों अखबारों को पढ़ें तो देखेंगे कि मिस्टर गांधी लोगों को कैसे धोखा दे रहे थे। अंग्रेजी अखबार में, उन्होंने खुद को जाति व्यवस्था, और अस्पृश्यता के विरोधी के रूप में पेश किया, और लोकतांत्रिक दिखने का ढोंग किया।  लेकिन अगर आप उनकी गुजराती पत्रिका पढ़ें, तो वे आपको ज्यादा रुढिवादी दिखेंगे, वहां वे जाति व्यवस्था, वर्णाश्रम धर्म, या उन सभी रुढिवादी हठधर्मिताओं का समर्थन करते रहे हैं, जिन्होंने युगों-युगों से भारत को दबाए रखा है। दरअसल ‘हरिजन’ अखबार में मिस्टर गांधी के बयानों और उनके गुजराती अखबार में उनके बयानों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए किसी को उनकी जीवनी लिखनी चाहिए। उनका गुजराती अखबार सात खंडों में संकलित है। पश्चिमी दुनिया केवल उनका अंग्रेजी अखबार पढ़ती है, जिसमें मिस्टर गांधी लोकतंत्र में विश्वास करने वाले पश्चिमी लोगों की निगाह में सम्मान पाने के लिए लोकतांत्रिक आदर्शों की वकालत करते हैं। लेकिन आपको यह भी देखना चाहिए कि उन्होंने वास्तव में अपनी जनभाषा के अखबार में लोगों से क्या बात की थी। अभी तक कोई भी शख्स इसका संदर्भ लेता हुआ नहीं दिखा। उनकी सभी जीवनियां उनके ‘हरिजन’ और ‘यंग इंडिया’ अखबारों पर ही आधारित हैं, कोई भी गांधी के गुजराती लेखन पर आधारित नहीं है।
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